सत्य घटना: एक अघोरी जब 27 साल बाद अघोर का मतलब समझाया।

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साल १९९९ था। गुजरात का गिरनार पर्वत—वो प्राचीन, रहस्यमयी पहाड़ जहाँ दत्तात्रेय की पदचिह्न आज भी चट्टानों पर अंकित हैं, और अघोर की परंपरा की जड़ें गहरी धँसी हुई हैं। मैं, मौलिक्क बुख, तब एक युवा जिज्ञासु था—पैरानॉर्मल और आध्यात्मिक रहस्यों की तलाश में। गिरनार की ऊँची चढ़ाई चढ़ते हुए, जहाँ हवा में धुनी की गंध और मंत्रों की गूँज मिलती है, मैं पहुँचा उस जगह पर जहाँ बाबा कीनाराम की यादें आज भी जीवित हैं।
रात थी, चाँद की रोशनी में अघोरी शिला की छाया लंबी पड़ रही थी। वहाँ एक साधु बैठे थे—चेहरा राख से पुता, माथे पर त्रिशूल, गले में हड्डियों की माला। नाम सिर्फ़ “बाबा”। उन्होंने मुझे देखा, और बिना पूछे कहा, “आया है सवाल लेकर? सुनने की हिम्मत है?”
उस रात हमने घंटों बात की—अघोर के बारे में, घृणा मिटाने के बारे में, शिव और शव के एक होने के बारे में। बाबा ने कहा था, “सवाल पूछने वाला अगर जवाब सुनने को तैयार न हो, तो वो सवाल मत पूछे।” मैंने सुना, लेकिन पूरी तरह समझा नहीं। वो मुलाकात मेरे मन में एक बीज की तरह बो गई—जो २७ साल तक बढ़ती रही।

आज फिर वही मुलाकात। बाबा वही थे—नाम सिर्फ़ “बाबा”। चेहरा राख से पुता हुआ, माथे पर तीन लकीरों वाला त्रिशूल का निशान, गले में रुद्राक्ष की माला और छोटी-छोटी हड्डियों की एक पतली डोरी। वो एक जलती चिता के पास बैठे थे, आँखें बंद, होंठ हिल रहे थे—शायद कोई मंत्र। मैं धीरे से उनके सामने बैठ गया। हवा ठंडी थी, लेकिन मन में एक अजीब गर्माहट।

मैंने धीमी आवाज़ में कहा,
“नमस्कार बाबा। इतने साल बाद… याद है वो रात, जब आपने कहा था—’सवाल पूछने वाला अगर जवाब सुनने को तैयार न हो, तो वो सवाल मत पूछे’?”

बाबा ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में आग की चमक नहीं, बल्कि एक गहरी शांति थी।
“भाई मौलिक्क… तू अभी भी वही है। सवालों का पीछा नहीं छोड़ता। बोल, आज क्या जल रहा है तेरे मन में?”

मैंने एक गहरी साँस ली। आसपास चिताएँ जल रही थीं—कोई रो रहा था, कोई चुपचाप प्रार्थना कर रहा था। मैंने पूछा,
“बाबा, लोग अघोर को देखकर डरते हैं। श्मशान में रहना, मृत देह का स्पर्श, कभी-कभी मांस… मदिरा… ये सब सुनकर कहते हैं—ये तो पागलपन है, अंधविश्वास है। आप क्या कहेंगे?”

बाबा ने हल्के से मुस्कुराया। उनकी मुस्कान में कोई दिखावा नहीं था।
“पागलपन नहीं, भाई। ये ‘अति’ से पार जाना है। संसार ने दो हिस्से बना लिए—शुद्ध और अशुद्ध। शुद्ध को पूजता है, अशुद्ध को छिपाता है, नकारता है। हम दोनों को एक देखते हैं।
जब तू माँ के गर्भ में था, तब तू मल-मूत्र, खून के बीच था। क्या वो अशुद्ध था? नहीं। वही शरीर बाहर आया तो अशुद्ध कहलाया। हम उस भेदभाव को मिटाते हैं। श्मशान में इसलिए बैठते हैं क्योंकि यहाँ झूठ नहीं चलता। यहाँ मौत नंगी है। मौत का सामना करने वाला ही जीना सीखता है।”

मैंने आगे पूछा,
“लेकिन बाबा, शास्त्रों में तो मांस-मदिरा वर्जित है। फिर अघोर इसे साधना का हिस्सा कैसे मानता है?”

बाबा ने चिता की ओर देखा। लपटें उनकी आँखों में प्रतिबिंबित हो रही थीं।
“शास्त्र अलग-अलग मन के लिए हैं। एक स्तर पर नियम हैं—पालन करने के लिए। दूसरा स्तर है—नियम तोड़ने का। हम अघोर मार्ग पर चलते हैं, जहाँ कोई मार्ग ही नहीं रहता। सब एकाकार हो जाता है।
मांस इसलिए नहीं खाते कि स्वाद चाहिए। इसलिए खाते हैं कि जो मरा, वो अब सिर्फ़ मांस-पिंड है। आत्मा जा चुकी। अगर तू उस मांस को देखकर घृणा करता है, तो घृणा अभी बाकी है। घृणा मिटेगी तभी भेद मिटेगा। तब शिव और शव एक हो जाते हैं।
मदिरा? वो एक औजार है। जब तक ‘मैं’ बाकी है, मदिरा तुझे गिराएगी। जब ‘मैं’ मिट जाता है, तब वही मदिरा चेतना को फैलाती है—उस जगह ले जाती है जहाँ समय रुक जाता है। लेकिन बिना गुरु के, बिना दीक्षा के ये जहर है। मत छूना।”

रात और गहरी हो गई। एक चिता धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी। बाबा ने एक लकड़ी उठाई, आग में डाली। चिंगारियाँ उड़ीं। मैंने पूछा,
“लोग सबसे ज्यादा ये पूछते हैं—क्या अघोरी काला जादू करते हैं? टोना-टोटका, वशीकरण?”

बाबा की आवाज़ गंभीर हो गई।
“जो काला जादू करता है, वो अघोरी नहीं। वो तांत्रिक है जो सिद्धि के पीछे भाग रहा है—पावर चाहता है। सच्चा अघोरी सिद्धि नहीं चाहता। वो मुक्ति चाहता है।
हमारे पास शक्ति आती है—बहुत। लेकिन हम उसका इस्तेमाल नहीं करते। इस्तेमाल करने वाला ‘अहं’ अभी ज़िंदा है। जब अहं जल जाता है, तब शक्ति अपने आप सही जगह लगती है। या चुप रहती है।”

मैंने पूछा,
“तो आप मदद करते हैं लोगों की?”

“जो मदद माँगने आता है, उसकी होती है। लेकिन हम किसी को बुलाते नहीं। जो आता है, वो पहले से तैयार होकर आता है। मदद का मतलब सिर्फ़ बीमारी ठीक करना नहीं। कभी मदद ये है कि हम उसे उसका अपना डर दिखा दें। डर बाहर नहीं—अंदर है।”

अब आखिरी सवाल। चाँद ढल रहा था। घाट पर अब सिर्फ़ हम दोनों थे—और जलती आगें।
“बाबा, आज का युवा क्या सीख सकता है आपसे?”

बाबा ने लंबी साँस ली। उनकी आवाज़ में अब एक अलग गहराई थी।
“घृणा छोड़ दे, भाई।
जितना तू दुनिया को जज करता है—गंदा, अच्छा, पवित्र, अपवित्र—उतना ही तू खुद को जज कर रहा है।
सब कुछ शिव है। गंदगी भी शिव, सुंदरता भी शिव। जन्म भी, मृत्यु भी।
जब ये समझ आएगी, तब तुझे श्मशान आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। तेरा मन ही श्मशान बन जाएगा। वहाँ तेरी सारी चिताएँ जलेंगी—ईर्ष्या की, क्रोध की, भय की। सब राख हो जाएँगी।
फिर सिर्फ़ राख बचेगी… और राख में शिव।”

मैंने सिर झुकाया। आँखों में आँसू थे—शायद भावुकता से, शायद सत्य से।
“धन्यवाद बाबा। आपकी ये बातें मेरे साथ हमेशा रहेंगी।”

बाबा ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया।
“जा… और जो समझा है, उसे जी। बोलने से नहीं, जीने से समझ आएगी।
हर हर महादेव।”

मैं उठा। पीछे मुड़कर देखा—बाबा फिर आँखें बंद कर चुके थे। चिताओं की लपटें उनकी छाया पर नाच रही थीं। मैं धीरे-धीरे घाट से उतरता रहा। हवा में अब भी वो मंत्र गूँज रहा था। मन में एक सवाल नहीं, एक शांति थी।

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maulikk.buch

Maulik Buch is a mystic and paranormal researcher and has conducted extensive research of 27 years meeting aghoris, Kapalik, Naga Sadhus, Tantrik, voodoo masters etc and is blessed, with expertise in Rudraksha, Aghor, Tantra, and Vedic rituals . Maulik is a journalist and communication consultant by profession.
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